Monday, May 02, 2011

नहीं कोई व्यथा, लेकिन भटकता घूमता है मन...

नहीं कोई व्यथा, लेकिन भटकता घूमता है मन,
मिला है राह का साथी, हमें बेलक्ष्य खालीपन |

हवा के साथ सूखे पात से हम उड़ चले जाते,
कभी मन है तो हम पत्थर के रूखेपन को अपनाते |

गगन से गीत पातें हैं, धरा की गोद मैं मचले,
जहाँ स्थिर रहे सदियों, वहीँ पल-पल कभी पिघले |


भटकने की इन्ही रंगीनियों में पा लिया जीवन,
मिटा कर के सभी रिश्ते, गगन में उड़ चले हैं हम |

- April 24, 1974

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